अमेरिका 🇺🇸 ईरान 🇮🇷 से चाहता क्या है , वो क्या मसला है जो लगभग 40 साल से उसने ईरान पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाये हुए हैं आख़िर उसकी वज़ह क्या है?

आओ

जानते हैं ,ध्यान से पढ़ना और समझना उम्मीद करता हूँ आप पढ़ते हुए ही समझ जाएँगे असली वज़ह क्या है-

ये साल था 1953 जो ईरान की तारीख़ में एक बहुत काला और तकलीफ़देह बाब माना जाता है। इसी साल अमेरिका (CIA) और ब्रिटेन (MI6) ने मिलकर ईरान के जम्हूरी तौर (लोकतांत्रिक) चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक को हटवा दिया। (तख्ता पलट)

इस कार्रवाई को बाद में “ऑपरेशन एजेक्स” कहा गया।

ये वाक़या सिर्फ़ ईरान की आज़ादी और खुदमुख़्तियारी पर चोट नहीं थी, बल्कि इसने पूरे मिडिल ईस्ट की पॉलिटिक्स और तेल की दुनिया पर भी गहरे असर छोड़े

मोहम्मद मोसद्दिक कौन थे?

मोसद्दिक का जन्म 1882 में तेहरान के एक अशराफिया (उच्च वर्ग) परिवार में हुआ। उन्होंने फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड से कानून और राजनीति की पढ़ाई की, और ईरान लौटकर राजनीति में सक्रिय हो गए। 1940 के दशक में वे संसद (मजलिस) के सदस्य बने और एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभरे।

मुसद्दिक क्यों निशाने पर आए?

मुसद्दिक एक क़ौमी और जनता-परस्त और बेहद पसंद किए जाने वाले नेता थे। उन्होंने 1951 में तेल ब्रिटेन के कंट्रोल से निकालकर देश के अपने (ईरान) कंट्रोल में लेने की कोशिश की, ताकि तेल से मिलने वाला पैसा ईरानियों को फायदा दे, किसी और देश को नहीं। इंडस्ट्री को क़ौमी (Nationalize) कर दिया
यानी तेल का कंट्रोल ईरान के हाथ में आ गया। जो पहले अमेरिका और ब्रिटेन गटक रहे थे

ब्रिटेन की कंपनी Anglo-Iranian Oil Company (बाद में BP) ईरान के तेल से अरबों कमा रही थी, और ईरान को सिर्फ़ 16% मुनाफ़ा मिलता था। ईरानी जनता इसे नाकाबिले-बर्दाश्त जुल्म समझती थी।

मुसद्दिक ने ये सिस्टम खत्म किया — बस यहीं से मसला शुरू हुआ। ब्रिटेन नाराज़, अमेरिका परेशान और तेल कम्पनियाँ बेचैन।

अमेरिका का डर 👇
उस दौर में जो सर्द जंग (Cold War) चल रही थी। अमेरिका को डर था कि अगर मुसद्दिक मज़बूत हुए और तेल पर पूरी तरह कंट्रोल ले लिया तो कहीं ईरान सोवियत / कम्युनिस्ट ब्लॉक की तरफ़ न चला जाए।

ब्रिटेन अमेरिका का मक़सद था तेल वापस अपने हाथ में लाना, क्योंकि बहुत बड़ा फ्री का खजाना/मुनाफा उनसे छीन गया था

फिर दोनों ने मिलकर गुप्त ऑपरेशन शुरू किया। मुसद्दिक का तख्ता पलट करने के लिए

1952 में MI6 ने CIA को मिलकर ईरान में दख़ल देने का प्लान दिया। अमेरिकी सदर Dwight Eisenhower और ब्रिटिश वज़ीर-ए-आज़म Winston Churchill ने इसकी मंज़ूरी दी। CIA अफ़सर Kermit Roosevelt Jr. को ऑपरेशन का इंचार्ज बनाया गया।

इस ऑपरेशन में शामिल था

अख़बारों और रेडियो के ज़रिए मुसद्दिक के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा
मुसद्दिक को “कम्युनिस्ट”, व जनता का दुश्मन” दिखाना
मुल्क के कुछ मौलवियों, अफ़्सरों, और पुलिस को रिश्वत देकर सड़कों पर और भीड़ें खड़ी कराना मुसद्दिक के ख़िलाफ़

15 अगस्त 1953 को पहली कोशिश नाकाम हुई,
मगर 19 अगस्त 1953 को ऑपरेशन कामयाब हुआ।

2013 में CIA ने बाकायदा मान लिया कि वो इस ऑपरेशन में शामिल थी।

मुसद्दिक को गिरफ़्तार कर लिया गया और ईरान के शाह (मोहम्मद रज़ा पहलवी) को दोबारा तख़्त पर बिठा दिया गया।

यहाँ एक और चीज समझने वाली हैं लोकतांत्रिक तरीक़े से बना शख़्स भी इन्हें क़ुबूल नही अगर वो इनका प्यादा बनने पर राज़ी ना हो तो पहला सबूत मुसद्दिक ख़ुद हैं दूसरा मिस्र के सदर डॉक्टर मुहम्मद मुर्सी , जो वहाँ मिस्र की तारीख़ में
पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आए थे लेकिन वो हटा दिए गए क्योंकि उन्होंने भी अपनी रीढ़ को सीधा रखना पसंद किया झुकना क़ुबूल नही किया ,ख़ुदमुख़्तारी की बात करते थे उम्मत के इत्तेहाद पर ज़ोर देते थे उनका भी निशाने इबरत बना दिया गया , अब आगे टॉपिक पर आते हैं

ईरान में तख्ता पलट कराने के बाद फिर से बंदर बांट शुरू

1954 में Iranian Oil Consortium बना, जिसमें
BP (ब्रिटेन) = 40%
अमेरिकी कंपनियाँ = 40%
बाक़ी ईरान को = 20%

यानी तेल फिर से मग़रिबी कंपनियों के हाथ में गया।
शाह की सरकार एक आमिरियत (dictatorship) में बदल गई। CIA ने ईरान की खुफ़िया एजेंसी SAWAK तैयार की, जो मानव हक़ूक़ (human rights) की खिलाफ़वर्ज़ियों के लिए मशहूर हुई।

ये दौर 1979 की इस्लामी इंक़िलाब(Revolution) तक चला।

ईरान में लोकतंत्र खत्म हुआ
शाह पहलवी की डिक्टेटरशिप मजबूत हुई
जानता के अंदर चंद सालों में पश्चिम-विरोधी जज़्बा बढ़ गया 1979 के इस्लामी इनक़िलाब की ज़मीन बनी
और फिर ईरान की जानता ने मगरिबी प्यादे शाह पहलवी को उखाड़ फेका

और इस्लामी इंक़लाब 1979 के बाद अमेरिका ब्रिटेन के मुँह से सोने का निवाला फिर से निकल गया जो आज तक हासिल नही हुआ उसे
दुबारा हासिल करने के लिए वही खेल चल रहा है आधी सदी बाद फिर से , जब हर हरबा फेल कर दिया 86 साल के बुजुर्ग खामैनाई साहब ने , तो बात जंगी सूरत-ए-हाल तक आ पहुँची है ख़बरों के मुताबिक़ जो अभी मुमकिन तो नज़र नही आती

ग़ैर तलब है कोई भी हुकूमत “आवाम से ही कमजोर और मज़बूत होती, आवाम साथ है तभी वो 40 साल से दुनिया भर के प्रतिबंध झेल कर भी किसी के मोहताज नही हैं ख़ुदमुख़्तार हैं , CIA MoSAd की लाख कोशिश के बाद भी 46 साल से रिजीम चेंज नहीं हो सकी अब तक क्योंकि रिजीम की पुस्त पर वफ़ादार आवाम की तादाद आज भी खड़ी है, जबकि नुक़सान भी बहुत झेले सैकड़ों वैज्ञानिक, इंजीनियर और वफ़ादार अफ़सर खोए हैं

इराक़ से भिड़ाया , शिया सुन्नी फ़िरक़ा वारियात फंडिंग कर के फैलाई ताक़ि ये बाक़ी मुसलमान दुनिया से कटे रहें
कोई मुस्लिम मुल्क भी इनका इत्तेहादी ना बने सके , मज़बूत मुस्लिम ब्लॉक बनकर ना उभर जाएं

लिखने को बहुत कुछ बाक़ी है लेकिन पोस्ट बहुत ज़्यादा बड़ी हो जाएगी

लेकिन अगर आज अमेरिका की शर्तें तस्लीम कर ली जाए उसको हिस्सा/भत्ता बाक़ी अरब मुल्कों की तरह दिया जाने लगे , हवाई जहाज़ गिफ्ट किए जाएँ , बिलियन डॉलर
इन्वेस्टमेंट के नाम पर पहुँचाये जाएँ , फिर क्या है पाबंदियां ख़त्म सारी , दिक्कत खत्म रिजीम चेंज करने की जरूरत भी खत्म। फिर सब चंगा सी

इस सारे खेल का असल पस-ए-मंज़र (तेल का खेल )

जहाँ से भत्ता /हिस्सा मिल रहा वहाँ कोई दिक्कत नही
जो हिस्सा नही दे रहे उनसे छीन लो (कु) करवा कर प्यादा बैठा दो

Faheem Qureshi ✍️

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